शिवपुरी : साहित्य उत्सव सम्पन्न। गीत,गजल,कविता, कहानी एवं व्यंग रचनाओं का हुआ पाठ।

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साहित्य उत्सव सम्पन्न।

गीत,गजल,कविता, कहानी एवं व्यंग रचनाओं का हुआ पाठ।

शिवपुरी।गत दिवस नगर की साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था श्री रामकिशन सिंहल फाउंडेशन द्वारा साहित्य के क्षेत्र में अभिनव प्रयोग किया गया जिसमें विभिन्न विधाओं के रचनाकारों ने अलग अलग सत्रों में अपनी बेहतरीन प्रस्तुतियां दीं।डॉ.हरि प्रकाश जैन के मुख्य आतिथ्य व वरिष्ठ साहित्यकार हरीश चन्द्र भार्गव की अध्यक्षता में दुर्गा मठ में सम्पन्न शिवपुरी साहित्य उत्सव के अंतर्गत व्यंग्य ,गीत ,नवगीत ,गजल ,लघु कथा व कविता के विविध सत्रों में पहली बार शहर के पचास से अधिक लेखकों ने भाग लिया जिसका संचालन अजय जैन अविराम तथा अखलाक खान ने सामूहिक रूप से किया।




व्यंग्य सत्र से कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें धर्मयुद्ध शीर्षक से डॉ. महेन्द्र अग्रवाल ने लोकतंत्र में होने वाले चुनावों की विसंगतियों का एक रूपक के माध्यम से बिम्ब प्रस्तुत किया।विनय प्रकाश नीरव ने वर्तमान साहित्यकारों की महत्वाकांक्षाओं का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत किया।प्रमोद भार्गव ने व्यंग्य के माध्यम राजनीतिक अनाचार को स्वर दिये। 

गीत सत्र का आरंभ मधुर कंठ के धनी योगेन्द्र बाबू शुक्ल ने किया। राकेश भटनागर ने बसंत ़ऋतु पर केन्द्रित गीत का पाठ किया ऋतु बसंत मन भा रही,महक रहा संसार।हरियाली हर ओर है, छाया हर्ष अपार।।वहीं संजय श्रीवास्तव ने वर्तमान साहित्यिक परिवेश की विडम्बनाओं का वर्णन किया।

अभिनय ही रह गया मंच पर सिर्फ तमाशे हैं

कविताएं भूखी भूखी हैं मुक्तक प्यासे हैं।

राजकुमार भारती ने कहा-

देख दिखाने गले मिल रहे भीतर भीतर खंजर।

नकली दुर्वा बाग सजाते असल जमीं है बंजर।गीत सत्र में अशोक मोहिते, देवेन्द्र शर्मा, श्रीमती मृदुला नामदेव ,श्रीमती हेमलता चौधरी ,हरिश्चंद्र भार्गव ने भी अपने अपने गीतों से रस वृष्टि की। डॉ.एच.पी.जैन ने शीत ऋतु का एक चित्र प्रस्तुत किया।

फूस की चादर लपेटी दूब ने

रात कोहरे में लगी है डूबने

नाग सी डसने लगी है ये हवा

राम जाने क्या करेगी ये हवा?

गजल सत्र में रिवायती गजलों के साथ जदीद रुझान की गजलों ने भी अपनी छटा बिखेरी।राजकुमार श्रीवास्तव ने अपनी बात कुछ यूं रखी-

कहां मिलेगी शीतलता धरती के आंचल में

छुपे ओस के अंतर में ही जब अंगारे हैं

अनहोनी तो होनी है ऐसे हालातों में

जब मर्यादा ने ही तन के वस्त्र उतारे हैं।

श्रीमती कल्पना सिनोरिया ने संकेतों में कहा-

उठ रहा है धुंआ सा कहीं से

हाय शबनम से गुल जल गया है।

रामकृष्ण मौर्य ने अंदाजे बयां में तगज़्जुल की छटा बिखेरी।-

निगाहें कातिल अदा में मस्ती नजर से मदिरा छलक रही है

गुलाबी लब हैं हसीन जुल्फें नजर भी मेरी फिसल रही है।

राधेश्याम सोनी ने यूं शेर कहा-

हो गया प्यार छुपाने की जरूरत क्या है

नाम लिख लिख के मिटाने की जरूरत क्या है

कवि रंगकर्मी संचालक दिनेश वशिष्ठ ने आधुनिक प्रवृत्तियों की आलोचना की।

बड़ा खराब है माहौल अब किधर बैठें 

चलो जुबान पर ताला लगायें घर बैठें 

शिव कुमार राय के शब्दों में - भूले नहीं हैं हम कोई बात आपकी, आती है हर घड़ी हमें याद आपकी।इस दौर में रफीक इशरत ग्वालियरी,याकूब साबिर ,निर्मल हरि, कालीचरण आदि ने भी अपनी शानदार गजलों से श्रोताओं का मनमोहा।राकेश भटनागर व राजकुमार भारतीय की लघुकथा के बाद कविता सत्र में सतीश श्रीवास्तव ने पिता पर केन्द्रित एक मार्मिक कविता प्रस्तुत की।वहीं प्रमोद गुप्ता भारती ने कविता की मर्यादा को रेखांकित किया-शबरी के बेरों सी मीठी और मृगनयनी सी चंचल है ,कविता है शिखर हिमालय का

कविता निर्मल गंगाजल है ?कविता चारण भाट नहीं न चेरी है न दासी है।कविता गंगा सी पावन है मथुरा है काशी है।राधा मोहन समाधिया ने मंहगाई तो बसंत श्रीवास्तव ने  भ्रष्टाचार को उजागर किया।भगवान सिंह यादव ने आंखों की विशेषताओं को उकेरा।अजय जैन अविराम ने कहा-आवरण दिखावटी, न भावना बनावटी, चादरें मैली हृदय से, कृपाकर उतार दे।इस सत्र में सर्व श्री प्रकाश चंद्र सेठ, ओमप्रकाश दुबे,रमेश वाजपेयी ,रूपकिशोर वशिष्ठ ,एम.एस.द्विवेदी ,त्रिलोचन जोशी आदि ने भी भाग लिया।कार्यक्रम का समापन डॉ.एच.पी जैन के समधुर गीत से हुआ।देर रात तक चले कार्यक्रम के अंत में अखलाक खान ने सभी अतिथियों व आमंत्रितों का आभार व्यक्त किया।

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